मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) और PMLA, 2002: भारत में बढ़ते मामलों पर रिपोर्ट

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हाल ही में, वित्त मंत्री द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत कुल 5,892 मामले लिए हैं। हालांकि, इनमें से केवल 15 मामलों में ही विशेष अदालतों द्वारा दोषसिद्धि हुआ । इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने ED को कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने, PMLA मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने और क्रिप्टोकरेंसी के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियम बनाने का आग्रह किया है।

मनी लॉन्ड्रिंग क्या है?

मनी लॉन्ड्रिंग वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से आपराधिक गतिविधियों जैसे- मादक पदार्थों की तस्करी या अवैध हथियारों के व्यापार से प्राप्त अवैध धन को वैध धन में बदला जाता है। यह प्रक्रिया धन के असली स्रोत, स्वरूप या स्थान को छुपाती है ताकि अपराधी बिना पकड़े अपने लाभ का उपयोग कर सकें। इस प्रक्रिया के तीन मुख्य चरण होते हैं:

  • प्लेसमेंट: अवैध धन को वित्तीय प्रणाली में डाला जाता है।
  • लेयरिंग: धन के स्रोत को छुपाने के लिए उसे जटिल लेन-देन के माध्यम से घुमाया जाता है।
  • इंटीग्रेशन: धन को वैध प्रतीत होने वाली परिसंपत्तियों या निवेशों में वापस लाया जाता है।

भार में मनी लॉन्ड्रिंग के बढ़ते मामले: प्रमुख कारण

  • कानूनी और प्रवर्तन से जुड़ी कमियाँ: PMLA की कुछ धाराओं का दुरुपयोग और अभियोजन में देरी के कारण क़ानून की प्रभावशीलता कम हुई है।
  • जटिल तकनीकें: डिजिटल मुद्राओं, क्रिप्टोकरेंसी और सीमा-पार लेन-देन का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग को और अधिक जटिल बनाता है, जिससे इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए, हाल ही में 260 करोड़ रुपये के वैश्विक साइबर धोखाधड़ी मामले में, ED ने पाया कि अवैध धन को क्रिप्टोकरेंसी में बदला गया था और हवाला ऑपरेटरों के माध्यम से उसका शोधन किया गया था।
  • शैडो इकॉनमी: भारत में असंगठित क्षेत्र और नकद-आधारित लेन-देन की बड़ी भूमिका से काले धन को आसानी से छुपाया जाता है। रियल एस्टेट और ज्वेलरी जैसे क्षेत्रों में भी विनियमन की कमी एक बड़ी चुनौती है।
  • कमजोर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: 85 से अधिक देशों के साथ दोहरे कराधान से बचाव के समझौतों (DTAA) के बावजूद, सूचना के साझाकरण में सीमाएँ हैं, जो जांच में बाधा डालती हैं।

धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 क्या है?

PMLA, 2002 को भारत में मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने और इस तरह की गतिविधियों से प्राप्त संपत्ति को ज़ब्त करने के लिए लागू किया गया था। यह अधिनियम ड्रग्स की तस्करी, स्मगलिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण जैसे अपराधों से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग को लक्षित करता है। इसके कुछ प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:

  • कुर्की और ज़ब्ती: यह अधिनियम अधिकारियों को अपराध से प्राप्त संपत्ति को कुर्क करने और ज़ब्त करने का अधिकार देता है।
  • जांच और ECIR: ED, PMLA के तहत प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) के आधार पर जांच शुरू कर सकती है, जिसके लिए FIR की आवश्यकता नहीं होती है।
  • सख्त ज़मानत की शर्तें: अधिनियम के तहत आरोपी को ज़मानत पाने के लिए अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है।
  • संस्थागत व्यवस्था: वित्तीय खुफिया इकाई (FIU-IND) बैंकों से संदिग्ध लेन-देन की रिपोर्ट प्राप्त कर उनका विश्लेषण करती है।

मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए आवश्यक कदम

  • सशक्त न्यायिक और संस्थागत सुधार: PMLA के तहत मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करना, जिससे मुकदमों में तेज़ी आए और सज़ा की दर बढ़े। साथ ही, वित्तीय खुफिया इकाइयों को मज़बूत करना और ED, FIU तथा आयकर विभाग जैसी एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना आवश्यक है।
  • डिजिटल और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी आधुनिक तकनीकों जैसे क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल लेन-देन को ट्रैक करने के लिए डिजिटल फॉरेंसिक का उपयोग करना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही, दोहरे कराधान समझौतों (DTAA) का प्रभावी उपयोग करके विदेशी एजेंसियों के साथ डेटा साझा करना और वास्तविक समय में सहयोग करना भी ज़रूरी है।
  • FATF मानकों का अनुपालन: प्रवर्तन एजेंसियों को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की सिफारिशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
  • कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता: PMLA के प्रावधानों का दुरुपयोग रोकने के लिए कुर्की और अभियोजन प्रक्रियाओं में अधिक न्यायिक निगरानी और सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में दोहराया है।

मनी लॉन्ड्रिंग भारत की आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है। यद्यपि PMLA एक मज़बूत कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी और कम दोषसिद्धि दर जैसी चुनौतियों को दूर करने के लिए कानूनी सुधार, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और संस्थागत जवाबदेही को मज़बूत करना आवश्यक है।



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