राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025: भारत में सहकारी समितियों का नया युग । Cooperative Movement in India

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  • सरकारी योजनाओं का एकीकरण: यह नीति मौजूदा सरकारी योजनाओं जैसे डेयरी अवसंरचना विकास निधि (DIDF), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) का लाभ उठाकर पाँच वर्षों के भीतर 2 लाख नई बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (M-PACS) स्थापित करने का लक्ष्य रखती है ।
  • समावेशी विकास और रोज़गार: यह नीति दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और युवाओं जैसे वंचित वर्गों को केंद्र में रखकर सहकारी संस्थाओं को अधिक समावेशी बनाने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य ग्रामीण आबादी को सशक्त बनाना और उन्हें व्यापक अर्थव्यवस्था में सक्रिय एवं समान भागीदारी के योग्य बनाना है।
  • विविधीकरण और शिक्षा: नीति के अंतर्गत सहकारिताओं को डेयरी, मत्स्य पालन, खाद्यान्न खरीद सहित 25 से अधिक क्षेत्रों में विस्तार करने के लिये प्रोत्साहित किया गया है. यह नीति भारत के पहले राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय के माध्यम से सहकारी शिक्षा को बढ़ावा देती है ।
  • प्रौद्योगिकीय प्रगति और वैश्विक सहभागिता: यह नीति सहकारी संस्थाओं को तेज़ी से बदलती, तकनीक-प्रधान विश्व में प्रतिस्पर्द्धी बनाए रखने के लिये आधुनिकीकरण का लक्ष्य रखती है. नीति में राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL) की स्थापना की गई है, ताकि सहकारी समितियों को चावल और गेहूँ जैसे निर्यात पर ध्यान केंद्रित करते हुए वैश्विक बाज़ारों तक पहुँचने में सहायता मिल सके ।

पुरानी (2002) बनाम नई (2025) राष्ट्रीय सहकारिता नीति की तुलना

भारत की राष्ट्रीय सहकारिता नीति में दो दशकों में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। नीचे दी गई तालिका 2002 और 2025 की सहकारी नीतियों के बीच मुख्य अंतरों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है:

विशेषता

पुरानी नीति (2002)

नई नीति (2025)

मुख्य लक्ष्य

सहकारी समितियों के वित्तीय ढाँचे को विकसित करना

सहकारी समितियों का पुनर्जीवन और आधुनिकीकरण; "सहकार से समृद्धि" दृष्टिकोण

नीति लाने का कारण

वैश्विक और तकनीकी परिवर्तनों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया

वैश्वीकरण, डिजिटल प्रगति और स्थानीय विकास की नई आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर

मुख्य उद्देश्य

स्वायत्तता और सीमित सरकारी हस्तक्षेप

सहकारिताओं को प्रोफेशनल, पारदर्शी और आधुनिक बनाना; रोज़गार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना

बड़ी पहलें

लोकतंत्र के मूल्यों का प्रचार

5 वर्षों में 2 लाख नई समितियाँ (PACS, डेयरी, मत्स्य); सभी सहकारी समितियों का कम्प्यूटरीकरण

प्रमुख चुनौतियाँ

आत्मनिर्भरता प्राप्त करना

प्रशासनिक अक्षमता, पुराने कानून, तकनीकी पिछड़ापन और राजनीतिक हस्तक्षेप से निपटना

नीति का दृष्टिकोण

व्यापक और सैद्धांतिक दिशा-निर्देश

कार्य-उन्मुख, स्पष्ट लक्ष्यों और समयसीमा पर आधारित जमीनी रणनीतियाँ

किसके द्वारा तैयार की गई?

कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि और सहकारिता विभाग

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में गठित 48 सदस्यीय समिति द्वारा

सरकारी समर्थन

सहकारिता मंत्रालय अस्तित्व में नहीं था

सहकारिता मंत्रालय (2021 में स्थापित) इस नीति का प्रमुख मार्गदर्शक

सहकारी समितियाँ क्या होती हैं?

  • सहकारी समिति एक स्वायत्त संगठन होता है, जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से शामिल होते हैं ताकि वे अपने साझा आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को एक साझे स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से संचालित उद्यम के माध्यम से पूरा कर सकें । ये "एक सदस्य, एक मत" के सिद्धांत का पालन करते हैं, जिससे प्रत्येक सदस्य को उसके पूंजी योगदान की परवाह किये बिना समान अधिकार प्राप्त होता है ।
  • भारत में सहकारी आंदोलन की शुरुआत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण ऋण और शोषण से निपटना था। इस आंदोलन को गति देने वाले प्रमुख कानूनी कदम वर्ष 1904 और वर्ष 1912 के सहकारी अधिनियम थे ।
  • स्वतंत्रता के बाद, सहकारिता भारत के विकास मॉडल का एक महत्वपूर्ण घटक बन गई. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) जैसे संस्थानों ने सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देने और उन्हें सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।

संवैधानिक एवं कानूनी समर्थन

  • 97वाँ संविधान संशोधन, 2011 के माध्यम से सहकारी समितियों को संविधान में संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। इसके अंतर्गत भाग IX-B (अनुच्छेद 243ZH - 243ZT) जोड़ा गया, जो सहकारी समितियों के गठन, संचालन और स्वतंत्रता से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट करता है।
  • अनुच्छेद 19(1)(c) सहकारी समितियों के गठन का अधिकार सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 43B उन्हें राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (DPSP) के रूप में बढ़ावा देता है ।
  • राज्य-स्तरीय सहकारी समितियाँ राज्य सूची के अंतर्गत आती हैं, जबकि बहु-राज्य सहकारी समितियाँ संघ सूची और बहु-राज्य सहकारी समितियाँ (MSCS) अधिनियम, 2002 द्वारा शासित होती हैं।
  • सहकारिता मंत्रालय की स्थापना 06 जुलाई 2021 में की गई थी ।
  • बहु-राज्य सहकारी समितियाँ (संशोधन) अधिनियम, 2023 ने सहकारी समितियों के संचालन में सुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने हेतु कई महत्त्वपूर्ण सुधार किये हैं, जिससे इन समितियों की कार्यप्रणाली अधिक जनउत्तरदायी और दक्ष बनी है।

भारत में सहकारी समितियों का स्तर और क्षेत्रवार वितरण

  • भारत में लगभग 42 लाख सहकारी समितियाँ हैं, जिनके लगभग 29 करोड़ सदस्य हैं, जो विश्व स्तर पर कुल सदस्यों का लगभग 27% है. IFFCO (भारतीय कृषक सहकारी उर्वरक लिमिटेड) और अमूल जैसी संस्थाएँ दुनिया की शीर्ष 300 सहकारी समितियों में शामिल हैं ।
  • महाराष्ट्र देश में सहकारी समितियों की संख्या में अग्रणी है, जहाँ 25% से अधिक सहकारी समितियाँ हैं. इसके बाद गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, और कर्नाटक का स्थान है ।

भारत में सहकारी क्षेत्र के लिये चुनौतियाँ और अवसर

प्रमुख चुनौतियाँ

  • कमज़ोर अवसंरचना: उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में सहकारी नेटवर्क अभी भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं है, जिससे दूरदराज़ क्षेत्रों तक इसकी पहुँच सीमित रहती है। यह क्षेत्रीय असमानता को और बढ़ाता है।
  • सदस्यों की सीमित भागीदारी: विशेषकर हाशिए पर स्थित समुदायों – जैसे महिलाएँ, अनुसूचित जाति/जनजातियाँ एवं अल्पसंख्यक – का सहकारिता व्यवस्था में कम प्रतिनिधित्व है। यह संस्थाओं की समावेशिता और लोकतांत्रिक संचालन को प्रभावित करता है।
  • वित्तीय अवरोध: संपार्श्विक की अनुपलब्धता, दस्तावेज़ों की कमी और औपचारिक बैंकिंग से दूरी के कारण कई सहकारी समितियाँ ऋण और वित्तीय संसाधनों तक प्रभावी पहुँच बनाने में असफल रहती हैं।
  • कौशल और प्रबंधन क्षमता का अभाव: अनेक सहकारी समितियों में प्रशिक्षित मानव संसाधनों और आधुनिक प्रबंधन पद्धतियों की कमी है, जिससे संस्थागत दक्षता और सेवा वितरण पर असर पड़ता है।
  • तकनीकी एकीकरण की चुनौती: डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, डेटा प्रबंधन और ऑनलाइन सेवाओं के एकीकरण में ग्रामीण सहकारी संस्थाओं को प्रशिक्षण, संसाधन और बुनियादी ढाँचे की कमी के चलते कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

 अवसर

  • आर्थिक सशक्तीकरण: दो लाख नए M-PACS की स्थापना और डेयरी, मत्स्य पालन तथा अन्य सहकारी क्षेत्रों का विस्तार, विशेष रूप से ग्रामीण एवं कृषि समुदायों के लिये व्यापक आर्थिक अवसर प्रदान करता है ।
  • वैश्विक उपस्थिति में वृद्धि: NCEL के गठन और निर्यात बाज़ारों के खुलने से सहकारी समितियों को वैश्विक मान्यता प्राप्त करने में मदद मिल सकती है, जिससे विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि हो सकती है ।
  • रोज़गार सृजन: NCP 2025 कृषि, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में लाखों नए रोज़गार के अवसर प्रदान कर सकता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोज़गारी की समस्या का समाधान हो सकता है ।
  • शासन में सुधार: वित्तीय रिपोर्टिंग के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करना, नियमित ऑडिट सुनिश्चित करना और सदस्यों की भागीदारी को बढ़ावा देना ।

निष्कर्ष:

  • सहकारी संस्थाएँ भारत में एक जमीनी स्तर का सशक्तिकरण आंदोलन हैं, जो किसानों, महिलाओं, श्रमिकों और लघु उद्यमियों को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाती हैं। ये संस्थाएँ समावेशी विकास, सहभागिता आधारित निर्णय-प्रक्रिया और आत्मनिर्भर समुदायों के निर्माण को बढ़ावा देती हैं। राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025 के तहत भारत सरकार सहकार से समृद्धि के अपने संकल्प को और अधिक सुदृढ़ करती है, जिसका लक्ष्य सहकारिता को सतत विकास, ग्रामीण पुनर्जागरण और समग्र समृद्धि का प्रमुख माध्यम बनाना है।

प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न:

1. राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
a) इसका मुख्य उद्देश्य सहकारी समितियों को पूरी तरह से निजी क्षेत्र के हवाले करना है।
b) यह नीति "सहकार से समृद्धि" के दृष्टिकोण पर आधारित है और 2 लाख नए M-PACS स्थापित करने का लक्ष्य रखती है।
c) इसे कृषि मंत्रालय द्वारा लागू किया जा रहा है, क्योंकि सहकारिता मंत्रालय अब समाप्त कर दिया गया है।
d) यह नीति केवल शहरी क्षेत्रों में सहकारी समितियों के विकास पर केंद्रित है।

उत्तर: (b)

2. भारत में सहकारी समितियों के संवैधानिक प्रावधानों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा सही नहीं है?
a) 97वें संविधान संशोधन ने सहकारिता को संवैधानिक दर्जा दिया और भाग IX-B जोड़ा।
b) अनुच्छेद 43B राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों में सहकारिता को शामिल करता है।
c) बहु-राज्य सहकारी समितियाँ राज्य सूची के अंतर्गत आती हैं।
d) अनुच्छेद 19(1)(c) सहकारी समितियों के गठन के अधिकार की गारंटी देता है।

उत्तर: (c) (बहु-राज्य सहकारी समितियाँ संघ सूची के अंतर्गत आती हैं।)

3. राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 की प्रमुख पहलों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है?

  1. NCEL– सहकारी समितियों को वैश्विक निर्यात बाजारों से जोड़ना।
  2. M-PACS– बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ स्थापित करना।
  3. त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय– सहकारी शिक्षा को बढ़ावा देना।

a) केवल 1 और 2
b) केवल 2 और 3
c) 1, 2 और 3
d) केवल 1 और 3

उत्तर: (c)

4. भारत में सहकारी आंदोलन की चुनौतियों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कारक सही है?
a) अत्यधिक डिजिटलीकरण और तकनीकी अधिभार के कारण सहकारी समितियाँ असफल हो रही हैं।
b) महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में सहकारी समितियों का पूर्ण अभाव है।
c) सदस्यों की सीमित भागीदारी, वित्तीय अवरोध और प्रबंधन क्षमता का अभाव प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
d) सहकारी समितियाँ केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।

उत्तर: (c)

5. सहकारी समितियों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. ये "एक सदस्य, एक मत" के सिद्धांत पर कार्य करती हैं।
  2. भारत में सहकारी आंदोलन औपनिवेशिक काल में किसानों के शोषण के विरोध में शुरू हुआ।
  3. अमूल और IFFCO वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध भारतीय सहकारी संस्थाएँ हैं।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
a) केवल 1 और 2
b) केवल 2 और 3
c) 1, 2 और 3
d) केवल 1 और 3

उत्तर: (c)

मुख्य परीक्षा (UPSC Mains) के लिए संभावित प्रश्न:

  1. "राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 भारत के सहकारी आंदोलन को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।" इस कथन के आलोक में नीति की प्रमुख विशेषताओं और चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
  2. सहकारी समितियाँ भारत में समावेशी विकास और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का एक प्रभावी माध्यम रही हैं। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
  3. 97वें संविधान संशोधन और सहकारिता मंत्रालय की स्थापना ने भारत के सहकारी क्षेत्र को किस प्रकार प्रभावित किया है?

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